Urdu Shayari in Hindi-उर्दू शायरी के खुदा Meer Taqi Meer (मीर तक़ी मीर) की नुमाइंदा शायरी

Urdu Shayari in Hindi of Meer Taqi Meer | उर्दू शायरी के खुदा के रूप में प्रसिद्ध मीर तक़ी मीर उर्दू अदब की वो हस्ती थे, जिनके लिए कुछ भी लिखते समय शब्दों का अभाव महसूस किया जा सकता है. मीर तकी “मीर” साहब 20 सितंबर को ही इस दुनिया-ए-फानी से कूच कर गए थे. मीर को शायरी (Urdu Poetry) का ख़ुदा कहा जाता है. कहते हैं ग़ालिब ने जब एक फकीर से मीर की एक नज्म सुनी तो उनके मुंह से बेसाख्ता निकला, ‘रेख्ते के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब, कहते हैं पिछले ज़माने में कोई मीर भी था.

Urdu Shayari in Hindi of Meer Taqi Meer 

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#1.

लब तेरे लाले नाब है दोनों
पर तमामी इताब है दोनों

है तकल्लुफ नकाब से रुखसार|
क्यों छुपे आफताब है दोनों

तन के मामुरे में यही दिल और चश्म
घर थे दो, सो खराब है दोनों

सो जगह उसकी आंखें पढ़ती हैं
जैसे मस्ते शराब है दोनों

पांव में वो नशा तलब का नहीं
अब तो सरमस्ते ख्वाब है दोनों

एक सब आग, एक सब पानी
दीदा ओ दिल अज़ाब  है दोनों

आगे दरिया थे दीद ए तर मीर|
अब जो देखो सराब है दोनों।


#2.

बंधा रात आंसू का कुछ तार सा|
हुआ अब्रे रहमत गुनहगार सा

कोई सादा ही उसको सादा कहे
लगे है हमें तो वो अय्यार सा

गुलो सर्व अच्छे सभी हैं वले|
न निकला चमन से कोई यार सा

फलक ने बहुत कहीं आज़ार लेक
न पहुंचा बहम उस दिल आज़ार सा

मगर तेरी आंख तेरी भी चिपकी कहीं
टपकता है चितवन से कुछ प्यार सा।


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#3.

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अब तो चुप लग गई है हैरत से
फिर खुलेगी जुबान जब की बात

नुक्ता दानाने रफ्ता की न कहीं
बात वो है है जो होवे अब को बात

किसका रू ए सुखन नहीं है इधर
है नजर में हमारी सब की बात

ज़ुल्म है कहर है कयामत है
गुस्से में उसके जेरे लब की बात।


#4.

आग सा तू जो हुआ ए गुले तर आन के बीच
सुबह की बाव ने क्या फूंक दिया कान के बीच

हाल गुलज़ार जमाना का है जैसे कि शफक़
रंग कुछ और ही हो जाए है इक आन के बीच

ताक की छांव में जूं मस्त पड़े सोते है
ऐंडती है निगाहें साया से मिज़शगान के बीच

हम न कहते थे कहीं ज़ुल्फ कहीं रुख़ न दिखा
इक ख़िलाफ़ आया न हिन्दू ओ मुसलमान के बीच

बावजूद से मिल्कियत न मलक में पाया
वो तकद्दुस कि जो है हाजरते इंसान के बीच

जैसी इज्जत मेरी दिवा में अमीरों के हुई
वैसी ही उनकी भी होगी मेरे दीवान के बीच

घर मे आइने केंकाब तक तुम्हे नाजां देखूं
कभी तो आओ मेरे दीद ए हैरान के बीच।।


Meer Taki Meer Urdu Shayari Mohabbat

#5.

आजकल बेकरार है हम भी
बैठ जा चलने हर हैं हम भी

आन में कुछ हैं, आन में कुछ है
तोहफा ए रोजगार हैं हम भी

मना ए गिरिया न कर तू ए नासेह
इसमें बेख्तियार हैं हम भी

मुद्दई को शराब हमको ज़हर
आकबत दोस्त दार है हम भी

गर ज़खूद रफ्ता है तेरे नज़दीक़
अपने तो यादगार है हम भी

मीर नाम इक जवां सुना होगा
उसी आशिक़ के यार है हम भी।।


#6.

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इधर से अब्र उठकर जो गया है
हमारी ख़ाक पर भी रो गया है

मसाइब और थे पर दिल का जाना
अजब एक सानिहा-सा हो गया है

मुक़ामीर खाना ऐ आफ़ाक़ वो है
की जो आया है यां कुछ खो गया है

सिरहाने मीर के कोई न बोलो
अभी टुक रोते रोते  सो गया है.


मीर तक़ी मीर की शायरी

#7.

इश्क़ में जी को साबरा ओ ताब कहाँ
उससे आँखे लगीं तो खवाब कहाँ

हस्ती अपनी है बीच में पर्दा
हम न होवें तो फिर हिज़ाब कहा

गिरिया ऐ शब् से सुर्ख हैं आँखें
मुझ ब्लानोश को शराब कहाँ

इश्क़ है आशिक़ों के जलने को
ये जहन्नुम में है अज़ाब कहाँ

इश्क़ का घर है मीर से आबाद
ऐसे फिर ख़ानमा ख़राब कहाँ


#8.

उम्र भर हम रहे शराबी से
दिले पुरखूं की एक गुलाबी से,

जी दहा जाये हैं सहर से आह,
रात गुजरेगी किस खराबी से,

खिलना कम-कम काली ने सीखा है
उसकी आँखों की नीमख्वाबी से

काम थे इश्क़ में बहुत पर “मीर”
हम ही फारिग हुए शिताबी से.


#9.

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उसका ख़िराम देख के जाया न जायेगा
ऐ कबक फिर बहाल भी जाया न जायेगा

हम कुश्तगाने इश्क़ है आबरू ओ चश्मे यार
सर से हमारे तेग का साया न जायेगा

हम रहरवाने राहे फ़ना हैं बरंगे उम्र
जावेंगे ऐसे खोज भी पाया न जावेगा

अब देख लो सीना भी ताज़ा हुआ है चाक
फिर हमसे अपना हाल दिखाया न जायेगा

हम बेख़ुदाने महफिले तस्वीर अब नए
आइंदा हमसे आप में आया न जायेगा

याद उसकी इतनी खूब नहीं मीर बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जायेगा..


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#10.

कल चमन में गुल ओ समन देखा
आज देखा तो बाग़ बन देखा

क्या है गुलशन में जो कफ़स में नहीं
आशिक़ों का जिला वतन देखा

घर के घर जलते थे पड़े तेरे
दागे दिल देखे सो चमन देखा

एक चश्मक दोसद सिनाने मिज़ा
उस नुकीले का बांकपन देखा

हसरत उसकी जगह थी ख़्वाबीदा
मीर का खोलकर कफ़न देखा..


#11.

जाए है जी निजात के गम में
ऐसी जन्नत गयी जहन्नुम में

है बहुत जैब चाकी ही जूं सुबह
पर के थी बेकली कफ़स में बहुत

देखिये अब के गुल के मौसम में
बेखुदी पर न मीर की जाओ

तुमने देखा है और आलम में


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#12.

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जो देखो वो कामत तो मालूम हो
की रूकश हुए हैं क़यामत से हम

खुदा से भी शब् को दुआ मांगते
न उसका लिया नाम गैरत से हम

रखा जिसको आँखों में इक उम्र, अब
उसे देख रहते है हसरत से हम

न मिल मीर अब के अमीरों से तू
हुए है फ़क़ीर उनकी दौलत से हम.


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#13.

बंधा रात आंसू का कुछ तार सा
हुआ अब्रे रहमत गुनहगार सा

कोई सादा ही उसको सादा कहे
लगे है हमे तो वो अय्यार सा

गुलो सर्व अच्छे सभी हैं वले
फलक ने बहुत खींचे आज़ार लेक

मगर आँख तेरी भी चिपकी कहीं
टपकता है चितवन से कुछ प्यार सा


#14.

मुँह तका ही करे है जिस-तिस का
हैरती है ये आइना किसका

शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ
फैज़ ऐ अब्र चश्मे तर से उठा

आज दामन वसीअ है इसका
ताब किसको जो हाले मीर सुने

हाल ही और कुछ है मज़लिस का.


#15.

यही मशहूर आलम है दो आलम
खुदा जाने मिलाप उससे कहाँ हो

जहाँ सिज़दे में हमने गश किया था
वहीँ शायद कि उसका आस्तां हो

तुम ऐ नाज़ुक तना हो वह कि सब के
तमन्ना ऐ दिल व आराम ऐ जां हो

किनारा यूँ किया जाता नहीं फिर
अगर पाए मुहब्बत दरमियाँ हो


आगे पढ़े:
दाग देहलवी की मशहूर शायरी

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